आज यह दीवार,

मेरी प्रोफाइल देखें ...
शूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत, पुर्जा, पुर्जा कट मरे, कबहुं न छाड़े खेत (बहादुर, शूरवीर वही है, जो धर्म के लिए लड़े, चाहे शरीर का पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट जाए, पर जंग का मैदान वह कभी न छोड़े) हमारा धर्म है सचाई, भारतीयता, ईमानदारी, भाईचारा...

Monday, May 21, 2012

किसी को दे के दिल कोई


चचा कितने गहरे हैं, उनके शेरों से पूछो:

किसी को दे के दिल कोई नवा-सन्ज-ए फ़ुग़ां क्यूं हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुंह में ज़बां क्यूं हो
(जब किसी को दिल ही दे दिया, तो उसका रोना कैसा? आखिर सीने में दिल नहीं, तो मुँह में ज़बान भी क्यूँ हो?)
वह अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़ा क्यूं छोड़ें
सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सर-गिरां क्यूं हो
(आशिक़ और महबूब दोनों अपनी आन के पक्के हैं. कोई भी दूसरे से यह भी नहीं पूछ रहा के वो इतना मग़रूर क्यूँ है. आखिर दोनो ही मग़रूर हैं न!)


किया ग़म-ख़्वारी ने रुसवा लगे आग इस मुहब्बत को
न लावे ताब जो ग़म की वह मेरा राज़-दां क्यूं हो
(आशिक़ के राज़दानों कि हमदर्दी और कमज़ोर-दिली कि वजह से वह बदनाम हुआ जा रहा है. आखिर ऐसे राज़दानों का क्या फ़ायदा?)

वफ़ा कैसी कहां का इश्‌क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ सँग-दिल तेरा ही सँग-ए आस्तां क्यूं हो
(ज़ालिम महबूब हमेशा यही कहता है के 'मेरे ज़ुलमों की शिकायत न किया करो, तुम तो वफ़ादार हो'. पर इसमे 'वफ़ा' का क्या काम, के अगर मेरी क़िसमत में सर ही फोडना है, तो उसी महबूब के चौखट के पत्थर पे ही क्यूँ?)


क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पह कल बिजली वो मेरा आशियां क्यूं हो
(बेहतरीन शेर! अभी-अभी एक नये ग़म की चपेट में आया इन्सान (पँछी) जो पहले ही ग़म में डूबा हुआ हो,अपने नये ग़म की अपेक्षा (ignore) करता है. पिँजरे में क़ैद पँछी, अपने बाहर बैठे दोस्त से कहता है "ऐ दोस्त, तू मुझे कल का चमन का पूरा हाल सुना, मत डर. कल जिस आशियाने पे बिजली गिरी है, वो तो मेरा हो ही नहीं सकता. मै पहले ही इतने दु:ख में हूँ, भला मुझ पे और ग़म क्यूँ आ-गिरने लगा?". बहुत खूब!!)

ये कह सकते हो हम दिल में नहीं हैं पर यह बतलाओ
कि जब दिल में तुम्हीं तुम हो तो आंखों से निहां क्यूं हो

(महबूब आशिक़ से कहता है 'क्यूँ गिला करते हो? क्या हम तुम्हारे दिल में नहीं रहते?खो'. पर आशिक़ कहता है 'अगर दिल में रहते हो, तो आँखों में क्यूँ नहीं दिखते?'...मिलने क्यूँ नहीं आते?)

ग़लत है जज़्ब-ए दिल का शिकवा देखो जुर्म किस का है
न खेंचो गर तुम अपने को कशाकश दर‌मियां क्यूं हो
(ऐ महबूब तू दिल के खिँचने का शिक़वा कैसे कर सकता है? तू अगर अपने दिल को खींचकर न रखे, मेरी ओर आने दे, तो ये कश-म-कश भला हो ही क्यूँ? भई वाह!)

ये फ़ितना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उसका आस्मां क्यूं हो
(तेरी दोस्ती से तो अच्छे-अच्छों के घर वीरान हो जायें)


यही है आज़माना तो सताना किस को कह्‌ते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहां क्यूं हो
(महबूब कभी कभी कहता है 'मैं तो तुम्हे आज़मा रहा था'. अगर वो रक़ीब का हो ही लिया, तो भला मेरा'इम्तिहान' लेने का क्या मतलब?)

कहा तुम ने कि क्यूं हो ग़ैर के मिलने में रुस्वाई
बजा कहते हो सच कहते हो फिर कहयो कि हां क्यूं हो
(महबूब रक़ीब से मिलता है. और कहता है 'भला इसमें रूसवाई क्यूँ हो?' इसपे आशिक़ कहता है 'तुम कितना सच कहती हो. तुम्ही मुझे बताओ, के रूसवाई क्यूँ हो?')


निकाला चाह्‌ता है काम क्या तानों से तू 'ग़ालिब'तेरे बे-मिहर कहने से वो तुझ पर मिहरबां क्यूं हो
(जैसा के चचा ने पूरि ग़ज़ल मे किया), आशिक़ महबूब को ताने मार्-मार के काम निकलवान चाहता है. पर ये तरीक़ा काम नहीं करता. भला महबूब को 'बेमिह्‌र' कहने से वो मेहरबान हो जायेगा?
 

Sunday, April 22, 2012

पृथ्वी दिवस : धरा की सुध तो लो -EARTH DAY


पृथ्वी दिवस , संयुक्त राज्य अमेरिका में 22 अप्रैल को मनाया जाता है, यह एक दिवस है जिसे पृथ्वी के पर्यावरण के बारे में प्रशंसा और जागरूकता को प्रेरित करने के लिए डिजाइन किया गया है.
इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गयी,और इसे कई देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है. यह तारीख उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद का मौसम है.
 

पृथ्वी दिवस : धरा की सुध तो लो -EARTH DAY


इस संसार में मां को भगवान से भी बढ़कर स्थान दिया गया है क्यूंकि वह ना सिर्फ हमें जन्म देती है ल्कि हमें पालपोस कर जीने और इस दुनिया में रहने के लायक बनाती है. मां अगर पल भर के लिए भी हमसे दूर हो जाए तो कितना बुरा लगता है ना और अगर खुदा ना करे वह मां बीमार हो जाए तो हम पर क्या बीतती है यह हम ही जानते हैं. लेकिन मां के प्रति यही प्रेम, भक्ति और भावना उस वक्त कहां चली जाती है जब हम प्रकृति पर अत्याचार करते हैं. एक मां तो हमें जन्म देती है पर यह प्रकृति भी तो एक मां ही है जो हमें ना सिर्फ जीने के लिए स्थान देती है बल्कि हमें भोजन भी देती है, इसी पृथ्वी से जीने के लिए हवा मिलती है.
 
आज विश्व भर में हर जगह प्रकृति का दोहन जारी है. कहीं फैक्टरियों का गंदा जल हमारे पीने के पानी में मिलाया जा रहा है तो कहीं गाड़ियों से निकलता धुंआ हमारे जीवन में जहर घोल रहा है और घूम फिरकर यह हमारी पृथ्वी को दूषित बनाता है. जिस पृथ्वी को हम मां का दर्जा देते हैं उसे हम खुद अपने ही हाथों दूषित करने में लगे रहते हैं.

पृथ्वी दिवस का इतिहास

प्रकृति पर बढ़ते अत्याचार और प्रदूषण की वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ी और विश्व स्तर पर लोगों को चिंता होनी शुरु हुई. आज ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन पृथ्‍वी के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है. 22 अप्रैल, 1970 को पहली बार इस उद्देश्य से पृथ्वी दिवस  मनाया गया था कि लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके. विश्व पृथ्वी दिवस की स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन (Gaylord Nelson) के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गयी थी.

1970 से 1990 तक यह पूरे विश्व में फैल गया. 1990 से इसे अंतरराष्ट्रीय दिवस के रुप में मनाया जाने लगा और 2009 में संयुक्त राष्ट्र ने भी 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस के रुप में मनाने की घोषणा कर दी.
 
लेकिन मात्र एक दिन पृथ्वी दिवस के रुप में मना कर हम प्रकृति को बर्बाद होने से नहीं रोक सकते हैं. इसके लिए हमें बड़े बदलाव की जरुरत है. हवा में बातें तो सभी करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत से जुड़ कर भी कुछ करना होगा तभी हम पृथ्वी मां के प्रति अपनी सच्ची श्रंद्धाजलि दे पाएंगे. आइए इस पृथ्वी दिवस पर शपथ लें कि आगे किसी कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जिससे इसको नुकसान पहुंचे और अगर ऐसा कोई काम करना भी पड़े तो उसके नुकसान को पूरा करने के लिए जरूर उचित कदम उठाएंगे.