आज यह दीवार,
शूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत, पुर्जा, पुर्जा कट मरे, कबहुं न छाड़े खेत (बहादुर, शूरवीर वही है, जो धर्म के लिए लड़े, चाहे शरीर का पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट जाए, पर जंग का मैदान वह कभी न छोड़े) हमारा धर्म है सचाई, भारतीयता, ईमानदारी, भाईचारा...

जी बहुत बड़ा हूँ मै, पर सच कहू तो लंगड़ा हूँ मै , सच्चाई को देखकर शर्म से गड़ा हूँ मै
एक साकी पर ही विश्वास था, बस वो ही मेरी आस था, होंगे हुज़ूर आप दौलत वाले और क्या मेरे पास था विश्वास का नाम भी धोखा निकला हाय क्या करू? साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?
धोखे की रोटी खाता हूँ, गम की सब्जी ही पाता हूँ, अश्को को पी जाता हूँ जब मैखाने जाता हूँ, नाम लेके साकी का अधरों पर पैमाना रखू? पर साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?
हालातो ने मशहूर किया है, कुछ कहने पर मजबूर किया है, बस आसू से रिश्ता मेरा खुशी ने मुझको दूर किया है, इतना मर मर की जिया हूँ अब और कितना मरू? पर साकी ही बैसाखी छीने तो मै क्या करू?
झूठ नहीं जानता, इसलिए लंगड़ा हूँ छल नहीं मानता, इसलिए लंगड़ा हूँ सीना नहीं तानता, इसलिए लंगड़ा हूँ, ये दुनिया कुछ कहे मुझे फर्क नहीं अगर साफ़ रहना, साफ़ कहना, जुल्म ना सहना लंगड़ापन है तो मै लंगड़ा ही सही तो मै लंगड़ा ही सही..........
दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।

पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।